इस भजन को सुबह सूर्योदय से पहले अकेले में बैठकर सुनने से आपका मन सांसारिक वस्तुओं में आशक्त नहीं होगा, कोई कितना भी कपट कर ले या कितना भी प्यार कर लें आपके मन पर उसका असर कम होगा और खुश रहेंगे।
ब्रह्मज्ञानी संत अष्टावक्र जी ने दुनिया को सटीक ज्ञान दे दिया है जिसे कोई अमल करे तो उसके लिए संसार एक बगीचे की तरह है जैसे बगीचे में सुबह फूल आया और शाम को झड़ गया वैसे ही इस संसार रूपी बगीचे में सुबह शरीर आया और शाम को झड़ गया अर्थात सुबह जन्म हुआ ओर शाम को मर गया।
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