ऋषि -
'ऋषि' वैदिक परंपरा से लिया गया शब्द है, जिसे श्रुति ग्रंथों को दर्शन करने वाले लोगों के लिए प्रयोग किया जाता है।
ऐसे व्यक्ति जिन्होंने अपनी विशिष्ट और विलक्षण एकाग्र शक्ति के बल पर वैदिक परंपरा का अध्ययन किया और विलक्षण शब्दों के दर्शन किये और उनके गूढ़ अर्थों को जाना और प्राणी मात्र के कल्याण हेतु उस ज्ञान को लिखकर प्रकट किया 'ऋषि' कहलाये।
“ऋषि: तु मन्त्र द्रष्टारा : न तु कर्तार"
अर्थात ऋषि मंत्र को देखने वाले हैं न कि उस मन्त्र की रचना करने वाले। यद्यपि कुछ विद्वान ऋषियों को वैदिक ऋचाओं की रचना करने वाले के रूप में भी व्यक्त करते हैं।
हमारे प्राचीनतम ऋषि अपने योग से परमात्मा को उपलब्ध हो जाते थे और जड़ के साथ साथ चैतन्य को भी देखने में समर्थ होते थे। वे भौतिक पदार्थ के साथ साथ उसके पीछे छिपी ऊर्जा को भी देखने में सक्षम होते थे।
मुनि -
मुनि भी एक तरह के ऋषि ही होते थे किन्तु उनमें राग द्वेष का आभाव होता था।
भगवत गीता के अनुसार "जिनका चित्त दुःख से उद्विग्न नहीं होता, जो सुख की इच्छा नहीं करते और जो राग, भय और क्रोध से रहित हैं, ऐसे निश्चल बुद्धि वाले संत मुनि कहलाते हैं।"
प्राचीन काल में मौन को एक साधना या तपस्या के रूप में माना गया है। बहुत से ऋषि इस साधना को करते थे और मौन रहते थे। ऐसे ऋषियों के लिए ही मुनि शब्द का प्रयोग होता है। कई बार बहुत कम बोलने वाले ऋषियों के लिए भी मुनि शब्द का प्रयोग होता था। कुछ ऐसे ऋषियों के लिए भी मुनि शब्द का प्रयोग हुआ है जो हमेशा ईश्वर का जाप करते थे और नारायण का ध्यान करते थे जैसे नारद मुनि।
साधु-
किसी विषय की साधना करने वाले व्यक्ति को साधु कहा जाता है। प्राचीन काल में कई व्यक्ति समाज से हट कर या कई बार समाज में ही रहकर किसी विषय की साधना करते थे और उस विषय में विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करते थे। विषय को साधने या उसकी साधना करने के कारण ही उन्हें साधु कहा गया।
संस्कृत में साधु शब्द से तात्पर्य है सज्जन व्यक्ति।
लघुसिद्धांत कौमुदी में साधु का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि “साध्नोति परकार्यमिति साधु "
अर्थात जो दूसरे का कार्य करे वह साधु है।
साधु का एक अर्थ उत्तम भी होता है ऐसे व्यक्ति जिसने अपने छह विकार काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर का त्याग कर दिया हो, साधु कहलाता है।
सन्यासी -
'सन्यास' से 'सन्यासी' शब्द की उत्पत्ति हुई है, जिसका अर्थ त्याग करना होता है। सब कुछ त्याग करने वाले व्यक्ति को ही सन्न्यासी कहते हैं। संपत्ति , गृहस्थ जीवन , सांसारिक जीवन और समाज का त्याग करने वाला व्यक्ति 'सन्यासी' होता है। वह अपना सम्पूर्ण जीवन परहित और परोपकार के कार्यों में लगा देता है। ध्यान योग द्वारा अपने आराध्य की भक्ति में ही लीन रहता है।
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