साहिर लुधियानवी की कलम से लिखी गई नज़्म के ये कुछ बोल हैं।
इस नज़्म के अल्फ़ाज़ भले ही कम हो लेकिन इसके मायने काफ़ी गहरे हैं।
इस नज़्म में साहिर ने ये बताया है कि कैसे हमारे आस पास की औरतों को वो इज़्ज़त नहीं मिल रही जिसकी वो असल में हक़दार हैं साथ ही उन्हें सिर्फ बगैर जज़्बात वाली किसी चीज़ की तरह समझा जाता है यानी "एक ज़िंदा लाश"।
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