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कबीर की साखियाँ, कबीर के दोहों को कहते हैं. कबीर ने श्रोता (ईश्वर) को साक्षी मानकर अपने दोहों की रचना की थी. इसलिए इनके दोहों को 'साखी' कहा जाता है. साखी का अर्थ है साक्षी यानी गवाही. कबीर ने जो कुछ आँखों से देखा उसे अपने शब्दों में व्यक्त करके लोगों को समझाया
कबीर की साखियों के कुछ उदाहरण:
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान.
आवत गारी एक है, उलटत होइ अनेक.
कह कबीर नहिं उलटिए, वही एक की एक.
माला तो कर में फिरै, जीभि फिरै मुख माँहि.
कबीर घास न नींदिए, जो पाऊँ तलि होइ.
जग में बैरी कोई नहीं, जो मन सीतल होय.
माला फेरत जुग भया, मिटा ना मन का फेर.
कर का मन का छाड़ि के, मन का मनका फेर.
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