उपेन्द्रनाथ 'अश्क' जी द्वारा रचित एकांकी - सूखी डाली - बहुत ही मार्मिक कहानी है जिसमें एक ऐसे परिवार की पृष्ठभूमि को स्पष्ट किया गया है जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता और तानाशाही के अंतर्गत चुनाव करने हेतु संघर्ष कर रहा है। यह सब एक नयी आधुनिक बहु जो एक लाहौर के प्रतिष्ठित व् सुशिक्षित एकांकी परिवार से एक बहुत बड़े संयुक्त कुटुंब में आयी है जिसकी रीढ़ की हड्डी - दादाजी - अपने बरसों से एक रह रहे परिवार को एक रखने हेतु कुछ भी करने हेतु सार्थक हैं।
इन बदलावों की चपेट में आयी नयी बहु - बेला की सास अपने बेटे के विवाह के लिए लिए चुनाव पर दोषी महसूस करती है और साथ ही साथ उनके अंदर द्वेष की भावना - जो बेला के दुर्व्यव्यहार के कारण आयी है - प्रधान है। तो आईये देखते हैं की छोटी भाभी की उस बेला नामक तूफ़ान में क्या मनोदशा रही।
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