How to Register Online FIR - online FIR- उत्तर प्रदेश में ऑनलाइन एफआईआर कैसे करे? | Online FIR in UP

Опубликовано: 12 Июль 2026
на канале: SACHCHA TECH
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#FIRUP BY SACHCHA TECH PANKAJ KUMAR PATHAK EXCEL JAN SEVA KENDRA
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किसी (आपराधिक) घटना के संबंध में पुलिस के पास कार्यवाई के लिए दर्ज की गई सूचना को प्राथमिकी या प्रथम सूचना रिपोर्ट (F I R) कहा जाता है। भारत में किसी भी व्यक्ति द्वारा शिकायत के रूप में प्राथमिकी दर्ज कराने का अधिकार है। ऐसे में प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए कई व्यक्तियों को न्यायालय का भी सहारा लेना पड़ा है। ...
क्या होती है एफआईआर?
एफआईआर एक दस्तावेज होता है जिसके आधार पर दोषी को सजा दिलाने के लिए पुलिस कार्यवाही शुरू करती है। किसी सामान के चोरी होने की स्थिति में बीमा क्लेम करने के लिए एफआईआर जरूरी होती है। इसके अलावा आपकी चीज के दुरुपयोग का खतरा रहता है जिससे आप किसी ऐसे अपराध में फंस जाते हैं जो आपने किया ही नहीं। ऐसी स्थिति में आपको किसी तरह के नुकसान से एफआईआर बचाती है।
किन मामलों में दर्ज होती है एफआईआर?
सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि किस तरह के मामले में केस दर्ज होता है। अपराध दो तरह के होते हैं ।असंज्ञेय और संज्ञेय अपराध। असंज्ञेय अपराध- असंज्ञेय अपराध मामूली अपराध होते हैं मसलन मामूली मारपीट आदि के मामले असंज्ञेय अपराध होते हैं। ऐसे मामले में सीधे तौर पर एफआईआर नहीं दर्ज की जा सकती, बल्कि शिकायत को मैजिस्ट्रेट को रेफर किया जाता है और मैजिस्ट्रेट इस मामले में आरोपी को समन जारी कर सकता है। फिर मामला शुरू होता है। यानी ऐसे मामले में चाहे जूरिस्डिक्शन हो या न हो किसी भी हाल में केस दर्ज नहीं हो सकता। संज्ञेय अपराध- दूसरा मामला संज्ञेय अपराध का होता है, जो गंभीर किस्म के अपराध के होते हैं। ऐसे मामले में गोली चलाना, मर्डर व रेप आदि होते हैं, जिनमें सीधे एफआईआर दर्ज की जाती है। सीआरपीसी की धारा-154 के तहत पुलिस को संज्ञेय मामले में सीधे तौर पर एफआईआर दर्ज करना जरूरी होता है।
क्या होती है जीरो एफआईआर?
अगर शिकायती के साथ किया गया अपराध उस थाने की जूरिस्डिक्शन में नहीं हुआ हो, जहां शिकायत लेकर शिकायती पहुंचता है, तो भी पुलिस को शिकायती की शिकायत के आधार पर केस दर्ज करना होगा। ऐसी स्थिति में बाद में शिकायत को संबंधित थाने में ट्रांसफर कर दिया जाता है। इस तरह की प्राथमिकी को ZERO FIR कहा जाता है। जब कोई भी शख्स किसी भी थाने में शिकायत लेकर पहुंचता है, तो पुलिस की पहली ड्यूटी होती है कि वह केस दर्ज करे। मामला अगर संज्ञेय अपराध से जुड़ा हो, तो चाहे अपराध देश के किसी इलाके में क्यों न हुआ हो, किसी भी दूसरे इलाके में केस दर्ज हो सकता है। पुलिस को अपराध के बारे में सूचना देने में देरी न हो, इसलिए जरूरी है कि उस शिकायत को दर्ज किया जाए। हाई कोर्ट के पूर्व जस्टिस आर. एस. सोढ़ी के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने अपने जजमेंट में कहा था कि चाहे अपराध किसी भी इलाके में हुआ हो, पुलिस जूरिस्डिक्शन के आधार पर एफआईआर दर्ज करने से मना नहीं कर सकती। पुलिस एफआईआर दर्ज करने के बाद किसी भी तरह से आनाकानी नहीं कर सकती। इसके पीछे मकसद यह है कि शिकायती की शिकायत दर्ज कर सबूतों को एकत्र किया जाए। अगर शिकायत दर्ज नहीं की जाएगी, तो छानबीन नहीं होगी और सबूत नष्ट होते रहेंगे लेकिन एक बार एफआईआर होने के बाद शिकायती का रोल खत्म हो जाता है और स्टेट केस हो जाता है और फिर पुलिस को छानबीन करनी होती है। इस लिहाज से जीरो एफआईआर का प्रावधान काफी कारगर है।
कितनी असरदार है जीरो एफआईआर?
जब भी कोई शिकायत हो और मामला संज्ञेय हो, तो पुलिस न सिर्फ एफआईआर करेगी बल्कि वह शुरुआती जांच भी करेगी ताकि शुरुआती साक्ष्य नष्ट न हों। पुलिस इस तरह की जांच के बाद जांच रिपोर्ट और एफआईआर को संबंधित थाने को रेफर करती है। इस प्रक्रिया में दर्ज एफआईआर जीरो एफआईआर कहा जाता है। कई बार रेप आदि की जब शिकायत की जाती है, तो तुरंत पीड़िता के मेडिकल आदि कराने जरूरी होते हैं। यही वजह है कि जीरो एफआईआर के बाद पुलिस छानबीन भी करती है और एमएलसी की रिपोर्ट आदि तैयार करती है और अगर ऐसा नहीं किया गया तो सबूत नष्ट होने का खतरा रहता है।
कैसे दर्ज कराएं FIR?
एफआईआर दर्ज कराने के लिए खुद से भी जाने की जरूरत नहीं है। घटना का चश्मदीद या कोई रिश्तेदार भी प्राथमिकी दर्ज करा सकता है। इमर्जेंसी की स्थिति में पुलिस फोन कॉल या ई-मेल के आधार पर भी प्राथमिकी दर्ज कर सकती है। एफआईआर में घटना की तारीख और समय एवं आरोपी का भी उल्लेख करना होता है। एफआईआर दर्ज होने के बाद शिकायतकर्ता को इसकी मुफ्त में एक कॉपी पाने का अधिकार होता है। एफआईआर में लिखा क्राइम नंबर भविष्य में रेफरेंस के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। FIR की कॉपी पर थाने की मुहर व पुलिस अधिकारी के हस्ताक्षर होने चाहिए।