PADMASAN LOTUS POSE ON YOGA SWISS BALL (50 MINUTES)

Опубликовано: 16 Июль 2026
на канале: Suresh Babu Gaur
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चैतन्य आसन : इस आसन को चैतन्य आसन इसलिए कहा गया है क्योंकि इस आसन में पूरी तरह चेतना की स्थिति में रहना पड़ता है, हमारी देह एवं देहि निरंतर ध्यान को अपने में ही समाहित किए रहती है। जरा सा ध्यान भंग होने पर हम स्थिर नहीं रह सकते। आसन के दौरान हम पूरी तरह संतुलन की अवस्था में रहते हैं दसों दिशाएं आसक्ति रहित होती हैं। हम पूरी तरह समत्व की स्थिति में होते हैं आसन के दौरान श्रीमद्भगवद्गीता में बताई गई जितनी भी बुराइयां हैं उन सब से परे रहते हैं एवं जितनी भी अच्छाइयां है वह हमारे अंदर समाहित होती हैं अतः यह आसन पूरी तरह से श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेशों का पालन करता है। यह पूर्णत: चैतन्य समाधि की स्थिति होती है। आसन के दौरान परम आनंद की अनुभूति होती है।श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार यह ब्राह्मी स्थिति होती है।