इस्राएल की भूमि में हन्ना नाम की एक स्त्री रहती थी। वह एक दयालु और प्रेमी पति एल्काना की पत्नी थी। लेकिन हन्ना एक गहरी पीड़ा से ग्रस्त थी—उसके कोई संतान नहीं थी।
हर वर्ष वह अपने परिवार के साथ शिलोह के मंदिर में उपासना और बलिदान चढ़ाने जाती थी। लेकिन जब वह अन्य महिलाओं को उनके बच्चों के साथ देखती, तो उसका दुःख और बढ़ जाता।
एक संध्या, अत्यधिक दुःखी होकर वह मंदिर में घुटनों के बल बैठी और प्रार्थना करने लगी। उसके होंठ हिल रहे थे, परंतु कोई आवाज़ नहीं निकल रही थी।
"हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर," वह फुसफुसाई, "यदि तू मुझे एक पुत्र देगा, तो मैं उसे जीवन भर के लिए तुझे समर्पित कर दूंगी।"
महायाजक एली ने उसे देखा और सोचा कि वह नशे में है। उसने कठोरता से पूछा, "तू कब तक इस अवस्था में रहेगी?"
हन्ना ने शीघ्र उत्तर दिया, "नहीं, मेरे स्वामी, मैं नशे में नहीं हूँ। मैं प्रभु के सामने अपना मन उंडेल रही हूँ।"
एली ने उसकी सच्चाई को समझा और कहा, "शांति से जाओ, और परमेश्वर तुम्हारी प्रार्थना सुने।"
कुछ समय बाद, परमेश्वर ने हन्ना की सुधि ली, और उसने एक पुत्र को जन्म दिया। उसने उसका नाम शमूएल रखा, जिसका अर्थ है "परमेश्वर ने सुना।"
जब शमूएल बड़ा हुआ, तो हन्ना ने अपना वचन पूरा किया। वह उसे मंदिर ले गई और एली के सुपुर्द कर दिया। उसने कहा, "मैंने इस बालक के लिए प्रार्थना की थी, और अब मैं इसे प्रभु को अर्पित करती हूँ।"
हालाँकि अपने पुत्र से दूर होना कठिन था, हन्ना का हृदय आनन्द से भर गया, यह जानकर कि शमूएल प्रभु की सेवा करेगा। और परमेश्वर ने अपनी विश्वासयोग्यता में उसे और भी संतानें दीं।
शमूएल इस्राएल के सबसे महान भविष्यवक्ताओं में से एक बना, जो हन्ना के विश्वास और परमेश्वर की अटूट प्रतिज्ञा का प्रमाण था।