ऐसा कोई भी कृत्य जिसके लिए किसी कानून में दंड का प्रावधान है अपराध (crime) कहलाता है। संसद या विधानमंडल द्वारा बनाए गए कानून तो है ही साथ ही न्यायालय के आदेश, कोई निजी संस्थागत कानून, रीति-रिवाज या परंपरा आधारित कानून आदि ऐसे ढेरों कानून हो सकते है जिसमें किसी कृत्य के लिए दंड का प्रावधान हो।
ऐसे में कितना भी बचने की कोशिश करें अपराध हो ही जाता है। इसीलिए अपराध के बारे में कुछ मूलभूत बातें तो हमें पता होनी ही चाहिए। तो अपराध क्या होता है ये तो हम समझ ही गए है अब आइये आगे की बात करते हैं।
कौन सा कृत्य अपराध होगा और उसकी सजा क्या होगी ये भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) यानी कि IPC 1860 में लिखा हुआ है। और अपराध को सत्यापित करने की प्रक्रिया क्या होगी, सजा देने की प्रक्रिया क्या होगी, उसको क्रियान्वित करने की प्रक्रिया क्या होगी इस सब की चर्चा आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Criminal Procedure Code) यानी कि CrPC 1973 में की गई है।
सीआरपीसी के सेक्शन 2 (सी) के अनुसार संज्ञेय अपराध ऐसे अपराध है जिसमें पुलिस किसी मुजरिम को बिना किसी वारंट के गिरफ्तार कर सकती है और बिना कोर्ट के अनुमति के प्रारम्भिक जांच आरंभ कर सकती है।
अब सवाल ये आता है कि कौन से अपराध के लिए पुलिस ऐसा कर सकती है तो सीआरपीसी (CrPC) के अनुसूची 1 में जितने भी अपराध दर्ज है और किसी कानून के तहत घोषित जितने भी अपराध है वे सब संज्ञेय अपराध है। पुलिस को जब भी लगेगा कि अपराध सीआरपीसी (CrPC) के अनुसूची 1 या किसी कानून के तहत हुआ है तो वे आरोपी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है और जांच शुरू कर सकता है।
संज्ञेय अपराध बड़े ही गंभीर किस्म के और समाज पर बुरा असर डालने वाले प्रकृति के होते हैं। जैसे कि – अपहरण, बलात्कार, मर्डर, चोरी, डकैती, दहेज मृत्यु इत्यादि हैं।
◾सीआरपीसी के सेक्शन 154 के तहत इस प्रकार के मामले में पुलिस को FIR दर्ज करना होता है। हालांकि वो चाहे तो FIR दर्ज करने से पहले कुछ प्रारम्भिक जांच कर सकता है। उसके बाद उसे निर्धारित समय में मैजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत किया जाता है। अगर प्रारम्भिक जांच से ये पता चल जाये कि आरोपी व्यक्ति सही में गुनहगार है तो दंडाधिकारी उसे गिरफ्तार करके जेल में डलवा सकता है।
◾यहाँ पर एक बात याद रखिए कि संज्ञेय अपराध ज़मानती भी हो सकते है और गैर-ज़मानती भी। जैसे कि IPC सेक्शन 509 के तहत अगर कोई व्यक्ति किसी लड़की या औरत को गलत इशारे या उस पे अश्लील कमेंट करता है तो इसे एक संज्ञेय अपराध माना गया है। लेकिन प्रकृति में ये ज़मानती होते हैं।
◾वैसे आमतौर पर संज्ञेय अपराध गैर-ज़मानती प्रवृति के ही होते हैं। इसके लिए एक सामान्य व्यवस्था ये है कि अगर किसी आरोपी ने ऐसा अपराध किया है जिस अपराध के लिए आरोपी को 7 साल या उससे अधिक की सजा या मृत्युदंड मिल सकता है तो ऐसे अपराध प्रकृति में गैर-ज़मानती और संज्ञेय होते हैं।
◾इसी प्रकार 3 साल से ऊपर और 7 साल से नीचे सजा वाले अपराध भी संज्ञेय होते है और गैर-ज़मानती होते हैं। लेकिन अगर आप अनुसूची 1 देखेंगे तो आप पाएंगे कई ऐसे मामले है जिसमें ये गैर-संज्ञेय और ज़मानती होते है। उदाहरण के लिए आप आईपीसी धारा 506 (2) देख सकते हैं।
लेकिन अगर किसी अपराध के लिए सजा 3 साल या उससे कम होने का प्रावधान है तो वे संज्ञेय भी हो सकते है या गैर-संज्ञेय भी। लेकिन प्रकृति में ज़मानती होते हैं। जैसे कि अभी ऊपर आईपीसी धारा 509 का एक उदाहरण देखा जो कि एक संज्ञेय अपराध है लेकिन चूंकि उसमें मिलने वाली सजा 3 साल की है इसीलिए उसे ज़मानती की श्रेणी में रखा गया है।
आमतौर पर 3 साल से कम सजा वाले अपराध गैर-संज्ञेय और ज़मानती होते हैं।
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