रुद्रप्रयाग अद्भुत है और यहां की मान्यताएं भी जब हम रुद्रप्रयाग पहुंचे तब हमारी मुलाकात एक साध्वी जी से हुई जो वहां स्थित माता के मंदिर की देखभाल करती हैं उन्होंने हमें रुद्रप्रयाग की पूरी कहानी सुनाई
जानकारी के अनुसार माना जाता है कि भगवान शिव के नाम पर ही इस प्रयाग का नाम रुद्रप्रयाग पड़ा कहते हैं कि भगवान शिव की तपस्या नारद मुनि ने यहीं पर की थी जिससे भगवान शंकर प्रसन्न हुए और नारद मुनि को रूद्र रूप में अपना दर्शन दिया था माना यह भी जाता है कि भगवान शंकर ने संगीत की शिक्षा व पुरस्कार स्वरूप वीणा महर्षि नारद को यही प्रदान की थी
स्कंद पुराण केदारखंड में इस बात का वर्णन मिलता है कि द्वापर युग में जब महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ तो भ्रातृहत्या के पाप से मुक्ति के लिए पांडवों ने भगवान शिव की खोज की और वह काशी पहुंचे लेकिन भगवान शंकर उन्हें काशी में नहीं मिले तब भगवान शिव को खोजते खोजते पांडव हिमालय तक आ गए
माना जाता है कि रुद्रप्रयाग से ही होते हुए पांडव केदारनाथ के लिए गए थे
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रुद्रप्रयाग में कुछ तो खास था यहां की फिजाओं में अलग सुकून महसूस होता था एक तरफ पहाड़ों कृष्ण खिलाएं और उसके बीच में अद्भुत संगम हम सभी सौभाग्यशाली है जो इस प्रयाग का दर्शन कर पा रहे हैं
हमारी सनातन परंपरा बहुत प्राचीन है आज वक्त है हमे अपनी सभी धरोहरों और अपनी संस्कृति की करीब से समझने का
आप सबके लिए हमने ये प्रयास शुरू किया है हमारे मध्यम से आप सभी को प्रभु इक्षा से सनातन संस्कृति की धरोहरों के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होगा आज आपने रुद्रप्रयाग की महिमा सुनी अब हम निकल पड़े है अपने तीसरे और अंतिम पड़ाव यानी देवप्रयाग रास्ते में आपको हम मां धारी देवी के मंदिर के दर्शन भी कराएंगे
तब तक के लिए हमे दीजिए विदा
जय श्री राम जय श्री कृष्ण