Devrani dai Waterfall Chhindwara | देवरानी दाई जलप्रपात छिंदवाड़ा

Опубликовано: 16 Июль 2026
на канале: Mohit Suryawanshi
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Devrani dai Waterfall Chhindwara | देवरानी दाई जलप्रपात छिंदवाड़ा

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देवरानी दाई पर्यटन स्‍थल
मंदिर की विशेषताएं:
तुरसी गाँव में स्थित देवरानी दाई मंदिर में कार्तिक पूर्णिमा से मेले की शुरुआत होती है। घटामाली नदी के प्राकृतिक सौंदर्य के बीच यह मेला भक्तों और सैलानियों से भर जाता है। देवरानी दाई का मंदिर घटामाली नदी के तट पर स्थित है और इसके पास का विशाल झरना इस स्थल को आकर्षक बनाता है।

कथा और आस्था:
मंदिर के समीप घटामाली नदी एक कुंड में गिरती है, जिसे देवरानी कुंड कहा जाता है। इस कुंड के साथ कई किवदंतियां जुड़ी हैं। एक कथा के अनुसार, एक महिला कुंड में गिर गई थी और उसी परिवार की एक अन्य महिला ने गाय की पूंछ पकड़कर उसे बचाया। इस कुंड में एक सोने की नथ पहने मछली देखी गई थी, जिससे इस स्थल का नाम देवरानी कुंड और मंदिर की देवी का नाम देवरानी दाई पड़ा।

चमत्कारिक मंदिर:
देवरानी दाई के प्रति लोगों की अगाध श्रद्धा है, खासकर इस मंदिर की देवी की खोए पशु तलाशने की चमत्कारिक क्षमता के कारण। ग्रामीण मानते हैं कि यदि जंगल में पशु खो जाए तो मंदिर के समीप पेड़ पर रस्सी बांधकर पशुओं को तलाशने निकला जाए तो पशु जल्द ही मिल जाते हैं।

मेले का आनंद:
मेले में तफरीह और भक्ति का मौका मिलकर आता है। पूरा परिवार यहां पहुंचता है और मंदिर में पूजा करता है। नदी तट पर भोजन बनाने की तैयारियां शुरू हो जाती हैं और बड़ी संख्या में लोग वहां भोजन बनाते हैं। मेले में सिंघाड़ा और आईना सबसे ज्यादा बिकने वाली चीजें हैं।

तंबू और मनोरंजन:
मेले में तंबू भी लगाए जाते हैं, जहां लोग ग्रामीण जीवन का आनंद उठाते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दौरान जंगल की शांति भंग हो जाती है और यहां जीवन का रस घोलने वाली विभिन्न आवाजें गूंजती हैं।

मंदिर तक पहुंचने का मार्ग:
देवरानी दाई मंदिर गाँव तुरसी और पंचायत सेमरताल में स्थित है। यहाँ पगारा से होकर पहुंचा जा सकता है। पगारा से सेमरताल होते हुए घटामाली नदी पार कर एक किलोमीटर पैदल चलकर मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। मेले के दौरान यहां पहुंचने के लिए वाहन भी चलते हैं।

देवरानी दाई से डुगरिया 02 किमी एवं बादल भोई गुफा :
अमर शहीद बादल भोई: स्वतंत्रता संग्राम के वीर योद्धा
जन्म और प्रारंभिक जीवन:
स्वतंत्रता सेनानी अमर शहीद बादल भोई का जन्म सन् 1845 (लगभग) में छिन्दवाड़ा जिले की परासिया तहसील के ग्राम डुगरिया तितरा में हुआ। आप श्री कल्याण सिहं भोई एवं श्रीमती विमला भोई की इकलौती संतान थे। स्वतंत्रता संग्राम में बादल भोई का अविस्मरणीय योगदान रहा है। सन् 1923 मंे तामिया में सम्पन्न कांग्रेस सभा में बादल भोई के नेतृत्व में हजारों आदिवासियों ने भाग लिया था। उसी सभा के बाद आदिवासी सेनानियों ने छिन्दवाड़ा के जिलाध्यक्ष निवास को घेरा था। स्वतत्रंता सेनानी श्री अर्जुन सिंह सिसोदिया के अनुसार ‘‘श्री बादल भोई ने अपने साथियों के साथ जिलाध्यक्ष के बंगले को घेरकर सरकारी खजाने पर धावा बोल दिया, जिसके फलस्वरूप निहत्थे आदिवासी क्रांतिकारियों पर लाठी चार्ज हुआ और श्री बादल भोई गिरफ्तार किये गये। ’’ बादल भोई ने स्वतंत्रता सेनानी श्री विश्वनाथ साल्पेकर के नेतृत्व में 21 अगस्त 1930 को रामाकोना में जंगल का कानून तोड़ा। इस पर अंग्रेज सरकार ने बादल भोई को महाराष्ट्र जेल में रखा, जहां पर सन् 1940 में जहर के कारण उनकी मृत्यु हुई। स्वतंत्रता- संग्राम में उनके योगदान को रेखांकित करने के उदद्ेश्य से राज्य शासन द्वारा छिन्दवाड़ा स्थित संग्रहालय का नामकरण ‘श्री बादल भोई राज्य आदिवासी संग्रहालय’ किया गया ।
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